हिंदी सिनेमा जगत का लंबे समय से सिर्फ अभिनेताओं का ही बोलबाला रहा है. ऐसे में अभिनेत्री चाहे जितनी बड़ी हो उसके हिसाब से रोल कम ही लिखे जाते हैं लेकिन, अब ऐसी अभिनेत्रियों की और फिल्मों की तादाद धीरे-धीरे बढाती जा रही है जिनमें पूरा फोकस फिल्म की हीरोइन पर किया जाता है, साथ ही ये नए जमाने की महिलाओं की नई सूरत और एक अलग अंदाज़ के साथ परोसती हैं, आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हम आपको बताते हैं कि उन चुनिंदा फिल्मों के बारे में जिन्होंने सिनेमा में महिलाओं की सूरत और सीरत बदलने में बड़ा योगदान किया।

जिंक काम आज भी सराहनिय है. पंगा, दंगल, क्वीन, मेरिकोम, मणिकर्णिका- द क्वीन ऑफ झांसी, पद्मावत, सांड की आंख, नीरजा, मर्दानी, थप्पड़, शकुन्तला देवी, गुंजन सक्सेना आदि. आज के दौर में बनने वाली ये फिल्मे महिला प्रधान रूप में सामने आई हैं जिसमे महिला जगत प्रधानता को बढ़ावा दिया गया है। फिल्मे या साहित्य कहते हैं समाज का दर्पण होते हैं। यह बदलाव ज़रूर भी है यदि बदलाव होना ज़रूरी भी है, क्योकि आज के समय में महलाएं पुरुष समाज से कई गुन्ह आगे हैं यदि सही तरीके से दखा जाए तो वह अपने लिए आने वाले समय में एक नए समाज का निर्माण करेंगी।

स्त्रियों की इस प्रकार की भूमिका के चलते फिल्मों से नारियों में भीतर खुद के प्रति जागरूकता पहुचेगी जिससे समाज में नारी अपने लिए अपने मूल्यों को समझ सकेगी. इसलिए फिल्मों में नारिवादिता दिखाना एक उचित नज़रिया होगा समाज को बदलने को लेकर।यह फिल्मे हर तरह के समाज के लोग देखते हैं जिसके चलते फिल्मों को एक बहेतर विकल्प के रूप में भी सामने लजा जा सकता है भविष्य में नारियों को जागरूक करने के लिए।

वही इसी तर्ज पर कई अभिनेता और फिल्म निर्माता ऐसी फिल्मों का भी निर्माण कर रहे हैं जिसमे नारी प्रधान हो. जैसे साल 2914 में नितेश तिवारी के निर्देशन में बनी दंगल इस फिल्म के लिए ज्यादा चर्चाएं तो मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान की रही लेकिन इसकी कहानी महिलाओं पर ही आधारित थी दरअसल, फिल्म में बताया गया कि लड़कियां भी आजकल लड़कों से कम नहीं हैं. यह फिल्म हरियाणा के कुश्तीबाज महावीर सिंह फोगाट की बेटियों गीता और बबीता फोगाट के जीवन पर आधारित है। इन दोनों का किरदार फिल्म में क्रमशः फातिमा सना शेख और सान्या मल्होत्रा ने निभाया है. फिल्म में दिखाया गया है कि गीता और बबीता ने देश को गौरवान्वित करने के लिए पहले खुद कितनी परेशानियां झेलीं? इस पुरुष प्रधान समाज में खाना पकाने की बजाय उन्होंने अखाड़े में उतरने की हिम्मत कैसे दिखाई? वही इस फिल में रुदिवादी समाज में रह रही स्त्रियों की विचारधारा को भी दर्शाया गया है।

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